Iran War
Iran War: भारत में पश्चिम एशिया में जारी तनाव को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। ईरान से जुड़े मौजूदा संघर्ष पर केंद्र सरकार की “चुप्पी” को लेकर विपक्षी दल कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है, लेकिन इसी बीच पार्टी के वरिष्ठ नेताओं Manish Tewari और Shashi Tharoor ने सरकार के रुख का समर्थन कर नई बहस छेड़ दी है। इससे कांग्रेस के भीतर मतभेद भी खुलकर सामने आ गए हैं।
चंडीगढ़ से सांसद मनीष तिवारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह भारत की लड़ाई नहीं है और देश को अपने हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत का पश्चिम एशिया में हमेशा सीमित प्रभाव रहा है और वहां के संघर्ष नए नहीं हैं। ऐसे में भारत को सोच-समझकर कदम उठाने की जरूरत है।
तिवारी ने भारत के रणनीतिक हितों पर जोर देते हुए कहा कि इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं, जिनकी सुरक्षा सर्वोपरि है। इसके अलावा भारत की ऊर्जा जरूरतें—जैसे कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और उर्वरक—भी काफी हद तक इसी क्षेत्र पर निर्भर हैं। उन्होंने कहा कि इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अगर सरकार सावधानी बरत रही है, तो यह सही रणनीति है।
उन्होंने “स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी” (रणनीतिक स्वायत्तता) का जिक्र करते हुए कहा कि इसका मतलब है अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए जटिल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में संतुलन बनाना। तिवारी के अनुसार, भारत को भावनात्मक प्रतिक्रिया देने के बजाय व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
वहीं, तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने भी सरकार के रुख को समर्थन दिया। उन्होंने एक लेख में लिखा कि भारत की चुप्पी का मतलब इस युद्ध का समर्थन करना नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए अपनाई गई सावधानीपूर्ण नीति है। थरूर ने इस युद्ध को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत “अनुचित” बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि भारत को जल्दबाजी में कोई कड़ा बयान देने से बचना चाहिए।
हालांकि, थरूर ने यह भी जोड़ा कि ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei के खिलाफ बयान अधिक त्वरित होना चाहिए था। उनके अनुसार, भारत को अपने मूल्यों और व्यावहारिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाना चाहिए।
दूसरी ओर, कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का रुख इससे अलग नजर आता है। लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या यह किसी हमले या हत्या के प्रति मौन समर्थन है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि इस संघर्ष के कारण करोड़ों लोग अनिश्चितता में हैं, जिनमें बड़ी संख्या में भारतीय भी शामिल हैं।
राहुल गांधी ने ईरान पर हुए एकतरफा हमलों और क्षेत्र के अन्य देशों पर ईरान की प्रतिक्रिया दोनों की आलोचना की और कहा कि संप्रभुता का उल्लंघन करने वाले ऐसे कदमों की निंदा होनी चाहिए। उनका मानना है कि भारत को स्पष्ट और संतुलित रुख अपनाना चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के भीतर विचारों के टकराव को उजागर कर दिया है। जहां एक ओर पार्टी का आधिकारिक रुख सरकार की आलोचना करने का है, वहीं उसके वरिष्ठ नेता राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए सरकार के संयमित दृष्टिकोण का समर्थन कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए पश्चिम एशिया का क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील है, जहां उसे कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना पड़ता है। एक ओर ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा है, तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय मंच पर नैतिक और राजनीतिक जिम्मेदारियां भी हैं।
ऐसे में भारत का मौजूदा रुख—न तो खुलकर समर्थन, न ही तीखी आलोचना—एक संतुलित कूटनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, घरेलू राजनीति में यह मुद्दा आगे भी बहस का विषय बना रह सकता है।
